अरावली पर्वत भारत की भौगोलिक पहचान में अरावली पर्वत श्रृंखला का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है यह न केवल भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है बल्कि उत्तर पश्चिम भारत के पर्यावरण संतुलन जलवायु नियंत्रण जैव विविधता और समस्या बताओ के विकास में भी इसकी अहम भूमिका रही है आज जब देश पर्यावरण संकट जल संकट और मरुस्थलीकरण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है तब अरावली पर्वत शृंखला एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में हैं और इसके उपलक्ष में मीटिंग बताई गई है ।
अरावली पर्वत श्रृंखला केवल पत्थरों का देर नहीं है बल्कि भारत की पर्यावरणीय जीवन रेखा है यह हमारी जलवायु जल जंगल और जीवन को संतुलित रखती है आज जरूरत है कि सरकार समाज और नागरिक मिलकर इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए अरावली को बचाना केवल पर्यावरण का सवाल नहीं बल्कि आने वाले पीडिया के भविष्य का सवाल है अगर आप भी चेतावनी नहीं मिली तो यह प्राचीन पर्वत श्रृंखला इतिहास के पन्नों में ही सिमटका रह जाएगी और इसे अपना आने वाला भविष्य काफी खतरा में साबित हो सकता है ।
अरावली पर्वत श्रृंखला का परिचय
अरावली पर्वत श्रंखला भारत के सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है जिसकी आयु लगभग 300 करोड़ वर्ष अंकित की गई है यह पर्वत श्रृंखला गुजरात के पालनपुर से लेकर दिल्ली तक लगभग 800 किलोमीटर लंबी है अरावली पर्वत श्रृंखला मुख्य रूप से गुजरात राजस्थान हरियाणा और दिल्ली राज्यों से होकर गुजराती है वैज्ञानिक दृष्टि से अरावली पर्वत श्रृंखला उसे कल की साक्षी है जब पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत हो रही थी समय के साथ अत्यधिक कटाव के कारण इसकी ऊंचाई कम होती चली गई लेकिन इसकी महत्व आज भी उतनी ही बनी हुई है जीतने की पहले थी
भौगोलिक विस्तार और प्रमुख क्षेत्र
अरावली पर्वत श्रृंखला का विस्तार इन कुछ राज्यों में देखा जाता है गुजरात के पालनपुर, अंबाजी क्षेत्र, राजस्थान के उदयपुर, माउंट आबू, अजमेर, अलवर, में है। हरियाणा के गुरुग्राम, फरीदाबाद में और दिल्ली के दक्षिण दिल्ली हरीश क्षेत्र में अरावली पर्वत की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर (माउंट आबू) में स्थित है जिसकी ऊंचाई लगभग 1722 मीटर है यह स्थान राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन भी है ।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
अरावली पर्वत श्रृंखला का संबंध भारत के प्राचीन सभ्यताओं से भी रहा है माना जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के विकास में अरावली पर्वत क्षेत्र से मिलने वाले तांबे और खनिज को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। राजपूत काल में अरावली पर्वतों ने प्राकृतिक किले का कार्य किया है चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और रणथंभौर जैसे दुर्ग इस पर्वत श्रृंखला के आसपास विकसित हुए हैं कुल्लभगढ़ का किला, जिसकी दीवार को “भारत की ग्रेट वॉल” भी कहा जाता है अरावली की गोद में स्थित है
जलवायु और पर्यावरण की भूमिका
विशेष यज्ञों के अनुसार अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर भारत के लिए प्राकृतिक जलवायु रक्षक की तरह कार्य करती है।
मरुस्थलीकरण रोकने में सहायक: – अरावली पर्वत को पूर्वी भारत की ओर से बढ़ने से रुकती है यह अरावली ना हो, तो रेगिस्तान हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैल सकता है। मानसून पर प्रभाव: – अरावली पर्वत श्रृंखला दक्षिण पश्चिम मानसून को रोककर राजस्थान की कुछ हिस्सों में वर्षा करने में मदद करती है भूजल संरक्षण: – अरावली की चट्टानें वर्षा जल को रोककर भोजन रिचार्ज में मदद करती हैं जिस कुएं, बावड़िया, जल स्रोत जीवित रहते हैं।
जैविक विविधता और वन्य जीव
अरावली क्षेत्र जैसी विविधता से भरपूर है यहां कई दुर्लभ वनस्पतियां और जीवों को पाए जाते हैं जैसे में तेंदुआ, सियार, नीलगाय, लोमड़ी और सांपों के विभिन्न पर जातियां। वनस्पतियों के भी कुछ प्रजातियां पाई जाती हैं जैसे में धोक, खेजड़ी, बाबुल, नीम , बरगढ़, पीपल दिल्ली का अरावली ब्रिज क्षेत्र राजधानी का “ग्रीन लंग” माना जाता है जो प्रदूषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।
खनिज संपदा और आर्थिक महत्व
अरावली पर्वत श्रृंखला खनिजों से समृद्ध रही है यहां से तांबा जस्ता शिक्षा संगमरमर और ग्रेनाइट जैसे खनिज पाए जाते हैं। राजस्थान के उदयपुर, भीलवाड़ा और अलवर जैसे क्षेत्र खनन गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं हालांकि अत्यधिक और अवैध खनन के कारण अरावली का अस्तित्व संकट में आ गया है ।
अवैध खनन के कारण सुप्रीम कोर्ट द्वारा कई बार प्रतिबंध लगाने के बावजूद हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों में अवैध खनन जारी है जिससे पहाड़ियां तेजी से नष्ट हो रही हैं। शहरीकरण दिल्ली में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्य ने अरावली के जंगलों को गंभीर नुकसान पहुंचा है वनों की कटाई, ईंधन ,सड़क निर्माण, और अतिक्रमण के कारण बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अरावली पर्वत श्रृंखला को बचाने के लिए न्यायपालिका ने कई अहम फैसले दिए हैं सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वत श्रृंखला के क्षेत्र में खनन पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं और इससे पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का बात की है केंद्र और राज्य सरकारी भी वृक्षारोपण अरावली ग्रीन वॉल परियोजना और वन संरक्षण अधिनियम के तहत प्रयास कर रही है लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभाव सीमित नजर आता है।
अरावली ग्रीन वॉल परियोजना
सरकार द्वारा शुरू की गई अरावली ग्रीन वॉल परियोजना का उद्देश्य अरावली पर्वत श्रृंखला के साथ बड़े पैमाने पर पौधारोपण की हरित पट्टी विकसित करना है इससे मरुस्थलीय कारण पर रोक, प्रदूषण में भी कमी, जल संरक्षण ज्यादा, रोजगार सीजन, जैसे लाभ मिलने की भी उम्मीद है।
भविष्य में पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यह अरावली पर्वत श्रृंखला का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में दिल्ली में प्रदूषण और बढ़ेगा, जल संकट गंभीर होगा, थार रेगिस्तान का विस्तार होगा, जैविक विविधता समाप्त होने वाले लगेंगे।





